Friday, 23 November 2012

आदत शहर की -

वाइजों ने तो मुझे नसीहत दी थी कई
नादाँ ये दिल मेरा किसी की सुनता ही नहीं

वो कहते थे नज़रें उनकी क़ातिलाना हैं
और ये जुमला मैंने कभी समझा ही नहीं

सोचा था हक़ीकत से मूह मोड़ लेंगे
कमबख्त यहाँ कोई सच बोला ही नहीं

आदत इस शहर की मुझ पर यूँ सवार थी

सरे आम मेरा क़त्ल हुआ और मैं चीखा ही नहीं

ख़ुदा ने जब माँगा मेरा शिकायतनामा
मैं सहम कर बोला मैंने कुछ देखा ही नहीं

No comments:

Post a Comment