कल जब बारिश में भीगकर लौटता था... माँ दौड़कर पल्लू से सर पौछ लेती थी.
आज जब भीगकर लौटा हूँ, तो तौलिये से लाख पौछा खुद को... ये आँखें अब भी भीगी है.
गरम चाय की ख़ुशबू... न जाने कहाँ से साँसों में तैर रही है.
छींकता हूँ तो एक चीख सी निकलती है... जैसे ये दिल किसी को पुकार रहा हो.
आज जब भीगकर लौटा हूँ, तो तौलिये से लाख पौछा खुद को... ये आँखें अब भी भीगी है.
गरम चाय की ख़ुशबू... न जाने कहाँ से साँसों में तैर रही है.
छींकता हूँ तो एक चीख सी निकलती है... जैसे ये दिल किसी को पुकार रहा हो.
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