Friday, 12 August 2011

नज़्म मेरी -

ज़िन्दगी दरवाज़े से हर बार गयी
मौत सिरहाने कई रात गुज़ार गयी 

कभी जो मेरा जिगर ना हुआ
आँखों ने समंदर बहा दिया
की बैठे थे थक कर इस पार
और नज़र फिर उस पार गयी
मौत सिरहाने कई रात गुज़ार गयी 

मोहब्बत के दाम बढें
और दर्द-ओ-गम बिकने लगें
एक ज़ख्म भरा भी ना था
की किस्मत आज फिर बाज़ार गयी
मौत सिरहाने कई रात गुज़ार गयी 

जल चुकी है रूह कब से अंदाज़ पे
अब जलता है जिस्म हर अलफ़ाज़ पे
यूँ ख्यालों को छल्ली कर के
मुझे आखिर मेरी नज़्म ही मार गयी
मौत सिरहाने कई रात गुज़ार गयी

Thursday, 11 August 2011

किसे क्या कहें -

किसको अच्छा कहें और बुरा किसे कहें
दिल में है तो ख़लिश पर यहाँ किसे कहें

जहां पीठ पर भी आँखें लगाये फिरना है
ऐसे माहौल में हम अपना किसे कहें

झोंखे भी ऐसे की साँसे जला देते हैं
गर ये हवा है तो फिर धुआं किसे कहें

भूखा है यहाँ मतलब का हर कोई
सोचता है ख़ुदा की अब सजदा किसे कहें

भूखे बच्चे को रोटी, कोई ख्वाहिश नहीं होती
ऐसी गुज़ारिश ना हो पूरी तो ख़ुदा किसे कहें

Tuesday, 9 August 2011

बारूद -

झूठ की शक्ल हर शब बदलती है
सच का चहरा नाबुद रहता है

कोई पक्का पता नहीं उनकी ज़ुबां का
वो
कहीं, और कहीं उनका वजूद रहता है
 
कौन आता है यूँ ही बेमतलब मिलने को
आज
कल इन्सान से मायूस, ख़ुदा भी ख़ुद रहता है
 
शहर भर में, घर मेरा मशहूर है
कहते
हैं वाइज़ जाना वहां तो मरदूद रहता है
 
कई दिलों में अब तक आग लगा चूका हूँ
मेरी
बातों में अक्सर थोड़ा बारूद रहता है

ज़िन्दगी का चहरा -

पेड़ों की टहनी गिर के इशारा करती है
चलो यार, अरसा गुज़र गया
आज कल कांधो पर झूलने नहीं आते

लम्बी खाली सडकें
ख़ामोशी से फुसफुसाती है
बहुत सी बातें करनी है तुम से
चलो एक long drive पे चलते हैं  

हवाओं में तैरती रही कटी पतंग
मानो कह रही हो, लपक लो यार
बहुत खिंच लिया खुद को
अब थोड़ी ढिल भी दे दो
 
वह तारों से भरा आसमान
हर रात आँखें टिमटिमा कर कहता है
कभी एक बार तो लौट आओ
मेरे आँचल में नींद गुज़ारने
मैंने कई कहानिया सजा रखी है तुम्हारे लिए
 
यूँ ही कभी गलियों में
तो कभी किसी चौराहे पर
ज़िन्दगी अक्सर पुकारती है
हजारों चेहरे पहनकर

क़त्लनामा -

किसी हादसे में 
मैंने मेरा एक ख़्वाब खो दिया
अब कौनसा ख़्वाब देखूं मुक़म्मल होने को
यहाँ हादसे भी तो बहुत होते हैं
क्या ये मेरे कुछ ना कर पाने का बहाना  है
या आनेवाले कल का डर 
लोग आशा की किरण क्यों ढूँढते हैं 
क्या रोज़ सूरज का उगना काफी नहीं
या अब कुछ कर दिखाने की चाह नहीं रही 
कब तक अपनी कमज़ोरियों को
नक़ाब पहनायेंगे
कब तक अपनी हार को
किस्मत का नाम देंगे
क्यों अपने आप के 
दुश्मन बने जाते हैं
और अपने क़त्लनामे पर 
सबसे पहली मुहर खुद लगाते हैं

चाँद का आयना –

निकलो तुम आज फिर
रात को निखरने दो
देखकर आयना कभी
चाँद को भी सवरने दो
 
उतार दो ये बिंदी
वहाँ तारों को जड़ना है
खुली रखना जुल्फें
अभी बादलों को उड़ना है
 
उठाकर पलकों को
समन्दर को जलने दो
देखकर आयना कभी
चाँद को भी सवरने दो
 
गुमसुम ये जहान
तेरी आवाज़ को बेक़रार है
लबों की हलचल का
कलियों को इंतजार है
 
तुम से चुराकर अदाएं
फूलों को भी तो खिलने दो
देखकर आयना कभी
चाँद को भी सवरने दो
 
चल थोडा लहराकर
आवारा सड़कों को संभलना है
लट हटा गालों से
जुगनुओं को पिघलना है
 
बाहों से आवाज़ देकर
आज आसमाँ को भी गिरने दो
देखकर आयना कभी
चाँद को भी सवरने दो

निकलो तुम आज फिर
रात को निखरने दो
देखकर आयना कभी
चाँद को भी सवरने दो