Tuesday, 9 August 2011

ज़िन्दगी का चहरा -

पेड़ों की टहनी गिर के इशारा करती है
चलो यार, अरसा गुज़र गया
आज कल कांधो पर झूलने नहीं आते

लम्बी खाली सडकें
ख़ामोशी से फुसफुसाती है
बहुत सी बातें करनी है तुम से
चलो एक long drive पे चलते हैं  

हवाओं में तैरती रही कटी पतंग
मानो कह रही हो, लपक लो यार
बहुत खिंच लिया खुद को
अब थोड़ी ढिल भी दे दो
 
वह तारों से भरा आसमान
हर रात आँखें टिमटिमा कर कहता है
कभी एक बार तो लौट आओ
मेरे आँचल में नींद गुज़ारने
मैंने कई कहानिया सजा रखी है तुम्हारे लिए
 
यूँ ही कभी गलियों में
तो कभी किसी चौराहे पर
ज़िन्दगी अक्सर पुकारती है
हजारों चेहरे पहनकर

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