किसी हादसे में
मैंने मेरा एक ख़्वाब खो दिया
अब कौनसा ख़्वाब देखूं मुक़म्मल होने को
यहाँ हादसे भी तो बहुत होते हैं
क्या ये मेरे कुछ ना कर पाने का बहाना है
या आनेवाले कल का डर
लोग आशा की किरण क्यों ढूँढते हैं
क्या रोज़ सूरज का उगना काफी नहीं
या अब कुछ कर दिखाने की चाह नहीं रही
कब तक अपनी कमज़ोरियों को
नक़ाब पहनायेंगे
कब तक अपनी हार को
किस्मत का नाम देंगे
क्यों अपने आप के
दुश्मन बने जाते हैं
और अपने क़त्लनामे पर
सबसे पहली मुहर खुद लगाते हैं
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