Wednesday, 18 May 2011

राहें अपनी –


राहें तो अपनी कभी
हमको भी बनानी थी
पर हर राह से गुज़रने को
हमें रिश्वत खिलानी थी
 
दुआओं से बढ़कर
कुछ हाथ आया
खाख़ ज़माने की
हमनें भी छानी थी
 
पल भर में कटकर
आँखों से ओझल हुई
पतंग ख्वाहिशों की जो
हमको भी उड़ानी थी  

झुककर खड़ा हूँ
ज़ानो पे धरा हूँ
बोरी ख्वाबों की जो
कांधों पे उठानी थी  

वह जिद्द भी कैसी थी
जिस में जवानी जला दी
किस्मत से लड़ने की
जो बचपन में ठानी थी

Thursday, 5 May 2011

ग़ालिब -

हम अपने से ऊंचे औहदे को 
अपनी राय बना लेते हैं 
यही एक वजह है 
की सदियाँ बीत गयी 
और ग़ालिब नहीं लौटा 

दूकान -

दूकान खुली है...
चवन्नी की झूठी मुस्कान 
बिलकुल असली लगेगी
दो आने प्यार की शीशी 
सुबह उठते ही एक बूँद 
आँखों में डालनी है 
बारह घंटे मजाल है 
कोई पकड़ के दिखाये
यहाँ ऑफर भी है
आप जो चाहें खरीदें 
एक सच मुफ्त मिलेगा 
पर कोई guarantee नहीं 
चलेगा  या  नहीं  चलेगा

आयने से मुलाकात -

अरसों बाद फिर वही बात हुई
कल शब आयने से मुलाकात हुई
 
कैसे आँखों में बिता था बचपन
चिलमिलाती धुप, चाँदनी रात हुई

बहाने पैरों को थिरकने के
कभी बर्थ डे, कभी बारात हुई

हर बात पे बस मुस्कुराना था
फिर चाहे जो भी बात हुई
 
अनबन हुई दोस्तों से कभी
तो करवटों में सारी रात हुई
 
मासूम ख्वाहिशें भीगती
की जब भी कभी बरसात हुई

ज़िन्दगी ज़िंदा नन्ही हथेली के साथ हुई
छूटकर जाने वो किसके हाथ हुई

अरसों बाद आयने से मुलाकात हुई

नये ज़माने की पुताई -


गहरे काले धब्बे, ताज़ा मुहासे,
८० साल पुरानी झुर्रियाँ, चेचक के दाग़
और चहरे के चुनिन्दा अवगुण से बना है
शुद्ध अहंकार...
चहरे पर मलते ही, ये सब ना होकर भी नज़र आयेंगे.
१००% कुदरती है
साइड इफेक्ट केवल रिश्तों पर पड़ेगा.

दिन बदल गया -


पैड-पौधे, हरी खिलखिलाती पत्तियां
फूलों की रंगत, रंगीन तितलियाँ
पत्तियों से सरकती ओस की बूँदें
गीली मिट्टी से उठती सोंधी सोंधी खुशबू
हवा की सरसराहट और चिड़ियों की किलकारियां
रंगों को निखारती सूरज की नर्म किरने

दिन जागा ही था
की मोटरों के होर्न और धुंए में
सब धुन्दला हुआ

मुखोटों के मूँह नहीं लगते -

हम मुखोटों के मूँह नहीं लगते
वरना देर नहीं लगती तख्ता पलटते

ऐसी भी क्या रंगीन हुई दुनिया
की देखा किया हर पल रंग बदलते

झूठ के दरख्तों पर हरियाली छाई है
सच की शाखों पर अब रिश्ते नहीं पकते

सन्नाटे की आदत -

कोई आहट होती है
तो
राहत होती है
सन्नाटे की भी
कैसी
आदत होती है  
ख़यालों के बुलबुले से बनते हैं
फूटते हैं... बिखरते हैं ...
ज़िद्दी उछलते बच्चे हैं ये
लाजवाब सवाल करते हैं
ज़हन से कूद कर निकले
तो फ़िर शरारत होती है

डर सा लगता है
अब तो इन से
पर तब जो...

कोई  आहट  होती  है
तो  राहत  होती  है
सन्नाटे  की  भी
कैसी  आदत  होती  है

तो चलो ...


तो चलो लहू में
थोड़ी शराब घोली जाए
की जो अब के जिगर से गुज़रे
तो क़यामत ढाए
 
बड़ी देर से बैठे हैं
एक ख़याल के इंतज़ार में
सूखे पड़े हैं ज़हन में
मेरे सोच के फ़व्वारें

एक प्याला भी मिल जाए
तो डूब के नहाए  

दिल को निचोड़ा जो मैंने
तो बूंद बूंद शेर निकला
देखा जो उसे गौर से
तो ज़र्रा ज़र्रा गैर निकला
 
घूँट भर भी मय मिल जाए  
फिर क्या अपने क्या पराये 

तो चलो ...