Monday, 1 September 2014

अभी बहुत है -

मेरी मज़ार के लिए ज़मीं नहीं है पर
मेरी खाख उड़ने के लिए आसमाँ अभी बहुत है

ख्वाबों की छत बस कल ही टूटी है लेकिन
आँगन में ख़्वाहिशों के मेहमां अभी बहुत है

जितना छल्ली हुआ मैं उतना ही मुस्कुराता गया
और वो कहीं एक खंजर लिए सेहमा अभी बहुत है

अभी तोह और भी दर्द सहने हैं मुझे कई
एक दोस्त के सीने में मेरे लिए अरमाँ अभी बहुत है

देखता हूँ रहता है कब तक रंग नफरत का
आँखों में मेरी मोहब्बत का सुरमा अभी बहुत है

Wednesday, 26 December 2012

मैं नींद में रहूँ -

चहरे पे ना आ जाए
तुझे पाने की जुस्तजू
की जब तेरा ख्वाब आये
मैं नींद में रहूँ

होगी तेरी ना ही
मैं ये जानता हूँ
दुआओं में भी अक्सर
मैं ये सोचता हूँ

की जब तेरा जवाब आये
मैं नींद में रहूँ

तेरे अदब में ना हो
मुझसे गुस्ताख़ी कोई
आँखों से ना बोल दे
मेरी बेख़ुदी कहीं

तो जब सामने शराब आये
मैं नींद में रहूँ

Saturday, 15 December 2012

एक हर्फ़ -

चेहरे पर रख कर हाथ
तूने फक़त एक हर्फ़ सुना है
दिल ने एक अल्फ़ाज़ से ही
जन्नत सा ख्व़ाब बुना है

तेरे लबों की मुस्कान जैसे
अरसों बाद किसी झोंके से
पत्तियाँ झूम के सरसरातीं हों

तेरे रुखसार की चमक जैसे
बर्फ़ीली वादियों में अचानक
धूप खुल के चिलमिलाती हो

तेरी आँखों की गहराई जैसे
बाहें खोलकर सीपियाँ
दो समन्दरों को सुलाती हों

तेरी ज़ुल्फों की करवटें जैसे
बिन तहज़ीबी बादलों को
अदा से उड़ना सिखाती हो

तू बेखबर क्या जाने
तुझसे किसने क्या चुना है
तेरे साए से हर ज़र्रे ने
जन्नत सा ख्व़ाब बुना है

Friday, 23 November 2012

कौनसा चोला पहनूँ -

शेर की खाल पहनूँ
या कुत्ते की ज़बान लगा दूँ
या फिर बकरी सा मिमयाता
मासूम बनता फिरूँ
इस महफ़िल-ए-जहाँ में
मैं कौनसा चोला पहनूँ

गुरुर ठूंस-ठूंस कर

सीना चौड़ा कर दूँ
या पैरों में हवा भर कर
दो गज ऊपर चलूँ
इस महफ़िल-ए-जहाँ में
मैं कौनसा चोला पहनूँ

आदत शहर की -

वाइजों ने तो मुझे नसीहत दी थी कई
नादाँ ये दिल मेरा किसी की सुनता ही नहीं

वो कहते थे नज़रें उनकी क़ातिलाना हैं
और ये जुमला मैंने कभी समझा ही नहीं

सोचा था हक़ीकत से मूह मोड़ लेंगे
कमबख्त यहाँ कोई सच बोला ही नहीं

आदत इस शहर की मुझ पर यूँ सवार थी

सरे आम मेरा क़त्ल हुआ और मैं चीखा ही नहीं

ख़ुदा ने जब माँगा मेरा शिकायतनामा
मैं सहम कर बोला मैंने कुछ देखा ही नहीं

बारिश -

कल जब बारिश में भीगकर लौटता था... माँ दौड़कर पल्लू से सर पौछ लेती थी.

आज जब भीगकर लौटा हूँ, तो तौलिये से लाख पौछा खुद को... ये आँखें अब भी भीगी है.

गरम चाय की ख़ुशबू... न जाने कहाँ से साँसों में तैर रही है.

छींकता हूँ तो एक चीख सी निकलती है... जैसे ये दिल किसी को पुकार रहा हो.

Thursday, 15 November 2012

अनजाना इंसान -


छीन ली गयी है रवायत खून से
और आदत भी रूह से
कितना अनजाना हो गया है
आज कल इंसान भी खुद से

जानता है नहीं है ख़ास
कोई जवाब उसके पास
फिर भी पूछे जाता है
कई सवाल उस बूत से
कितना अनजाना हो गया है

आज कल इंसान भी खुद से

अब और क्या पेश करने
रह गयी हैं दलीलें
वो रखते हैं उम्मीदें
सच की भी झूठ से
कितना अनजाना हो गया है
आज कल इंसान भी खुद से

हर एक साँस गिरवी रखी है
जवानी भी किश्तों से ढकी है
असल क्या है किस को पता
पहले छूटे तो सूद से
कितना अनजाना हो गया है
आज कल इंसान भी खुद से

नए खानसामाओ का ज़माना है
कुछ तो ख़ुराफात पकाना है
बनी है गाय के मॉस से खीर
उसी गाय के दूध से
कितना अनजाना हो गया है
आज कल इंसान भी खुद से