Saturday, 15 December 2012

एक हर्फ़ -

चेहरे पर रख कर हाथ
तूने फक़त एक हर्फ़ सुना है
दिल ने एक अल्फ़ाज़ से ही
जन्नत सा ख्व़ाब बुना है

तेरे लबों की मुस्कान जैसे
अरसों बाद किसी झोंके से
पत्तियाँ झूम के सरसरातीं हों

तेरे रुखसार की चमक जैसे
बर्फ़ीली वादियों में अचानक
धूप खुल के चिलमिलाती हो

तेरी आँखों की गहराई जैसे
बाहें खोलकर सीपियाँ
दो समन्दरों को सुलाती हों

तेरी ज़ुल्फों की करवटें जैसे
बिन तहज़ीबी बादलों को
अदा से उड़ना सिखाती हो

तू बेखबर क्या जाने
तुझसे किसने क्या चुना है
तेरे साए से हर ज़र्रे ने
जन्नत सा ख्व़ाब बुना है

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