छीन ली गयी है रवायत खून से
और आदत भी रूह से
कितना अनजाना हो गया है
आज कल इंसान भी खुद से
जानता है नहीं है ख़ास
कोई जवाब उसके पास
फिर भी पूछे जाता है
कई सवाल उस बूत से
कितना अनजाना हो गया है
आज कल इंसान भी खुद से
अब और क्या पेश करने
रह गयी हैं दलीलें
वो रखते हैं उम्मीदें
सच की भी झूठ से
कितना अनजाना हो गया है
आज कल इंसान भी खुद से
हर एक साँस गिरवी रखी है
जवानी भी किश्तों से ढकी है
असल क्या है किस को पता
पहले छूटे तो सूद से
कितना अनजाना हो गया है
आज कल इंसान भी खुद से
नए खानसामाओ का ज़माना है
कुछ तो ख़ुराफात पकाना है
बनी है गाय के मॉस से खीर
उसी गाय के दूध से
कितना अनजाना हो गया है
आज कल इंसान भी खुद से
अब और क्या पेश करने
रह गयी हैं दलीलें
वो रखते हैं उम्मीदें
सच की भी झूठ से
कितना अनजाना हो गया है
आज कल इंसान भी खुद से
हर एक साँस गिरवी रखी है
जवानी भी किश्तों से ढकी है
असल क्या है किस को पता
पहले छूटे तो सूद से
कितना अनजाना हो गया है
आज कल इंसान भी खुद से
नए खानसामाओ का ज़माना है
कुछ तो ख़ुराफात पकाना है
बनी है गाय के मॉस से खीर
उसी गाय के दूध से
कितना अनजाना हो गया है
आज कल इंसान भी खुद से
No comments:
Post a Comment