Thursday, 15 November 2012

जहान-ए-ज़ायका -

ज़िन्दगी निचोड़ ली गयी है
अब बस खाख़ पिसना बाकी है
जहान-ए-ज़ायके के लिए
अभी थोड़ा और घिसना बाकी है

ठंड से कम्बल की अब मिठास कहाँ
धुप में अब वो सेक कहाँ
बारिश के छपाके रसीले नहीं रहे
कीचड़ में भी अब वो महेक कहाँ 



ढीली कर दी खाल सुखा कर
बस गीली कर के खींचना बाकी है
जहान-ए-ज़ायके के लिए
अभी थोड़ा और घिसना बाकी है

ढांचे हैं मुस्कुराहटों के कई
शर्म में भी अब कोई स्वाद नहीं
महंगी ख़ुशी ज़रा सी पड़ती है
दर्द पे मिर्च भी अब और बढ़ गयी

अश्कों से फसलें तो बहुत उगा ली
अभी फलों में खून सींचना बाकी है
जहान-ए-ज़ायके के लिए
अभी थोड़ा और घिसना बाकी है

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