Thursday, 5 May 2011

तो चलो ...


तो चलो लहू में
थोड़ी शराब घोली जाए
की जो अब के जिगर से गुज़रे
तो क़यामत ढाए
 
बड़ी देर से बैठे हैं
एक ख़याल के इंतज़ार में
सूखे पड़े हैं ज़हन में
मेरे सोच के फ़व्वारें

एक प्याला भी मिल जाए
तो डूब के नहाए  

दिल को निचोड़ा जो मैंने
तो बूंद बूंद शेर निकला
देखा जो उसे गौर से
तो ज़र्रा ज़र्रा गैर निकला
 
घूँट भर भी मय मिल जाए  
फिर क्या अपने क्या पराये 

तो चलो ...

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