Tuesday, 9 August 2011

चाँद का आयना –

निकलो तुम आज फिर
रात को निखरने दो
देखकर आयना कभी
चाँद को भी सवरने दो
 
उतार दो ये बिंदी
वहाँ तारों को जड़ना है
खुली रखना जुल्फें
अभी बादलों को उड़ना है
 
उठाकर पलकों को
समन्दर को जलने दो
देखकर आयना कभी
चाँद को भी सवरने दो
 
गुमसुम ये जहान
तेरी आवाज़ को बेक़रार है
लबों की हलचल का
कलियों को इंतजार है
 
तुम से चुराकर अदाएं
फूलों को भी तो खिलने दो
देखकर आयना कभी
चाँद को भी सवरने दो
 
चल थोडा लहराकर
आवारा सड़कों को संभलना है
लट हटा गालों से
जुगनुओं को पिघलना है
 
बाहों से आवाज़ देकर
आज आसमाँ को भी गिरने दो
देखकर आयना कभी
चाँद को भी सवरने दो

निकलो तुम आज फिर
रात को निखरने दो
देखकर आयना कभी
चाँद को भी सवरने दो

No comments:

Post a Comment