Friday, 12 August 2011

नज़्म मेरी -

ज़िन्दगी दरवाज़े से हर बार गयी
मौत सिरहाने कई रात गुज़ार गयी 

कभी जो मेरा जिगर ना हुआ
आँखों ने समंदर बहा दिया
की बैठे थे थक कर इस पार
और नज़र फिर उस पार गयी
मौत सिरहाने कई रात गुज़ार गयी 

मोहब्बत के दाम बढें
और दर्द-ओ-गम बिकने लगें
एक ज़ख्म भरा भी ना था
की किस्मत आज फिर बाज़ार गयी
मौत सिरहाने कई रात गुज़ार गयी 

जल चुकी है रूह कब से अंदाज़ पे
अब जलता है जिस्म हर अलफ़ाज़ पे
यूँ ख्यालों को छल्ली कर के
मुझे आखिर मेरी नज़्म ही मार गयी
मौत सिरहाने कई रात गुज़ार गयी

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